Urdu Poetry | Saghar Siddiqui | 15 Best Poetry Images


Urdu Poetry | Saghar Siddiqui | 15 Best Poetry Images

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کانٹے تو خیر کانٹے ہیں اس کا گلہ ہی کیا
پھولوں کی واردات سے گھبرا کے پی گیے

कांटे ठीक कांटे हैं, झुंड क्या है?
पुष्प व्यवस्थाओं से निराश

Kantay To Khair Kantay Hain Is ka Gila He Kia
Pholoon Ki Wardaat sy Ghabra Ky Pe Gae

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ایک وعدہ ہے کسی کا، جو وفا ہوتا نہیں
ورنہ ان تاروں بھری راتوں میں کیا ہوتا نہیں
جی میں آتا ہے، الٹ دیں انکے چہرے سےنقاب 
حوصلہ کرتے ہیں، لیکن حوصلہ ہوتا نہیں
شمع جس کی آبرو پر جان دے دے جھوم کر
وہ پتنگا جل تو جاتا ہے، فنا ہوتا نہیں
اب تو مدت سے، رہ و رسمِ نظارہ بند ہے 
اب تو ان کا طُور پر بھی سامنا ہوتا نہیں
ہر شناور کو نہیں ملتا، تلاطم سے خراج
ہر سفینے کا محافظ، ناخدا ہوتا نہیں
ہر بھکاری پا نہیں سکتا مقامِ خواجگی
ہر کس و ناکس کو تیرا غم عطا، ہوتا نہیں
ہائے یہ بیگانگی، اپنی نہیں مجھ کو خبر
ہائے یہ عالم، کہ تو دل سے جدا ہوتا نہیں 
بارہا دیکھا ہے ساغر رہ گذارِ عشق میں
کارواں کے ساتھ اکثر رہنما ہوتا نہیں

किसी का वादा है, जो पूरा नहीं हुआ
अन्यथा, इन तारों वाली रातों में क्या होता है?
अंदर आओ, एक नज़र रखना और खुद का आनंद लें!
प्रोत्साहित करें, लेकिन प्रोत्साहित न करें
उस मोमबत्ती को उड़ाओ जिसके सम्मान पर तुम प्राण देते हो
वह पतंग जलती है, वह नष्ट नहीं होती
अब से, अनुष्ठान बंद है
अब उनका सामना भी नहीं होता
हर शराब पीने वाले को उथल-पुथल नहीं मिलती
हर जहाज का संरक्षक भगवान नहीं है
हर भिखारी को अपराध करने की जगह नहीं मिल रही है
आपका दुःख हर किसी को नहीं दिया जाता है
ओह, यह अजनबीपन, आपका नहीं, मुझे बताइए
काश, यह दुनिया, तुम दिल से जुदा न हो
मैंने इसे कई बार प्यार के समंदर में देखा है
कारवां के पास अक्सर एक गाइड नहीं होता है
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تم گئے رونقِ بہار گئی
تم نہ جاؤ بہار کے دن ہیں

तुम वसंत के पास गए
मत जाओ, यह वसंत है

اگر کبھی نیند آ جائے توسوبھی لیا کر ساغر
راتوں کو جاگنے سے بچھڑے لوٹا نہیں کرتے

यदि आप कभी सो जाते हैं, तो इसे समुद्र में ले जाएं
रात में जागने से बछड़े वापस नहीं आते हैं

کل جنہیں چھونہیں سکتی تھی فرشتوں کی نظر
آج وہ رونقِ بازار نظر آتے ہیں

स्वर्गदूतों की आँखें जो कल नहीं छू सकती थीं
आज वे फलफूल रहे हैं

جگمگاتے ہوئے ستاروں کو
تیرے پاؤں کی دھول کہتا ہوں
اتفاقا تمہارے ملنے کو 
زندگی کا حُصول کہتا ہوں

टिमटिमाते तारे
मैं इसे आपके पैरों की धूल कहता हूं
संयोग से आपसे मिलने के लिए
मैं कहता हूं जीवन का लाभ

اپنے ہونے کی خبر کس کو سناؤں ساغر
کوئی زندہ ہو تو میں اس سے کہوں زندہ ہوں

सागर, मैं अपने अस्तित्व की खबर किससे कहूं?
अगर कोई जीवित है, तो मैं उसे बताता हूं कि मैं जीवित हूं

سوچتے ہیں حسرتوں کے موڑ پر شام و سحر
جائیں گے ساغر کہاں ان کی گلی سے روٹھ کر

शाम के बारे में सोचो और पछतावा के मोड़ पर सुबह
सागर अपनी गली से कहाँ जाएगा?

اب اپنی حقیقت بھی ساغر بے ربط کہانی لگتی ہے
دنیا کی حقیقت کیا کہیے کچھ یاد رہی کچھ بھول گئے

अब भी इसकी वास्तविकता एक कहानी की तरह प्रतीत होती है
संसार की वास्तविकता क्या है? कुछ को याद किया गया है, कुछ को भुला दिया गया है

آج پھر بجھ گئے جل جل کے امیدوں کے چراغ
آج پھر تاروں بھری رات نے دم توڑ دیا

आज फिर से जलती हुई आशाओं का दीपक जल गया है
आज फिर से तारों वाली रात मर गई

میں آدمی ہوں کوئی فرشتہ نہیں حضور
میں آج اپنی ذات سے گھبرا کے پی گیا

मैं एक आदमी हूं, कोई फरिश्ता नहीं
मैंने आज अपनी जाति से पिया

آؤ ایک سجدہ کریں عالمِ مدہوشی میں
لوگ کہتے ہیں کہ ساغر کو خدا یاد آتا نہیں

आइए नशे की दुनिया में एक वेश्यावृत्ति करें
लोग कहते हैं कि सागर भगवान को याद नहीं करता

ہے دعا یاد مگر حرف دعا یاد نہیں
میرے نغمات کو انداز نوا یاد نہیں
میں نے پلکوں سے درِ یار پہ دستک دی ہے
میں وہ سائل ہوں جسے کوئی صدا یاد نہیں
میں نے جن کے لیے راہوں میں بچھایا تھا لہو
ہم سے کہتے ہیں وہی عہدِ وفا یاد نہیں
کیسے بھر آئیں سرِ شام کسی کی آنکھیں
کیسے تھرائی چراغوں کی ضیاء یاد نہیں
صرف دھندلائے ستاروں کی چمک دیکھی ہے
کب ہوا کون ہوا کس سے خفا یاد نہیں
زندگی جبرِ مسلسل کی طرح کاٹی ہے
جانے کس جرم کی پائی ہے سزا یاد نہیں نہیں
آؤ اک سجدہ کریں عالمِ مدہوشی میں
لوگ کہتے ہیں کہ ساغر کو خدا یاد نہیں

हां, मुझे प्रार्थना याद है, लेकिन मुझे प्रार्थना शब्द याद नहीं है
मुझे अपने गानों की शैली याद नहीं है
मैंने अपनी पलकों से दरवाजा खटखटाया
मैं एक भिखारी हूं जिसे कोई आवाज याद नहीं है
जिस खून के लिए मैंने रास्ते में बिछाया
हमें कहा जाता है कि हम एक ही वाचा को याद न रखें
शाम को किसी की आंखें कैसे भरें
तीन दीपकों की रोशनी को मैं कैसे याद नहीं कर सकता?
मैंने केवल मंद तारों की टिमटिमाहट देखी है
मुझे याद नहीं है कि कब क्या हुआ, कौन हुआ, कौन किससे नाराज़ था
लगातार जुल्म की तरह जिंदगी कट रही है
मुझे अपराध की सजा याद नहीं है
नशा की दुनिया में चलो
लोग कहते हैं कि सागर भगवान को याद नहीं करता

یہ جو دیوانے سے دو چار نظر آتے ہیں
ان میں کچھ صاحبِ اسرار نظر آتے ہیں
تیری محفل کا بھرم رکھتے ہیں سو جاتے ہیں
ورنہ یہ لوگ تو بیدار نظر آتے ہیں
دور تک کوئی ستارہ ہے نہ کوئی جگنو
مرگِ امید کے آثار نظر آتے ہیں
میرے دامن میں شراروں کے سوا کچھ بھی نہیں
آپ پُھولوں کے خریدار نظر آتے ہیں
کل جنہیں چھو نہیں سکتی تھی فرشتوں کی نظر
آج وہ رونقِ بازار نظر آتے ہیں
حشر میں کون گواہی میری دے گا ساغر
سب تمہارے ہی طرفدار نظر آتے ہیں

यह एक बोरी की तरह दिखता है जो ड्रॉस्ट्रिंग के साथ संलग्न होता है
उनमें से कुछ रहस्य हैं
उन्हें आपकी पार्टी का भ्रम है और सो जाते हैं
अन्यथा, ये लोग जागते हुए दिखते हैं
दूरी में कोई तारा नहीं, कोई प्रकाश नहीं
मौत के संकेत दिखाई दे रहे हैं
मेरे पैरों पर शरारत के सिवाय कुछ नहीं है
आप एक फूल खरीदार की तरह दिखते हैं
कल स्वर्गदूतों की आँखें उन्हें छू नहीं सकती थीं
आज वे फलफूल रहे हैं
पुनरुत्थान, सागर में कौन मेरी गवाही देगा?
हर कोई आपकी तरफ लगता है

آ جا کہ انتظارِ  نظر ہیں کبھی سے ہم
مایوس ہو نہ جائیں کہیں زندگی سے ہم
اے عکسِ زلفِ یار ہمیں تو پناہ دے
گھبرا کے آگئے ہیں بڑی روشنی سے ہم 
برسوں رہی ہے جن سے رہ و رسمِ دوستی
ان کی نظر میں آج  ہوئےاجنبی سے ہم
اس رونقِ بہار کی محفل میں بیٹھ کر
کھاتے رہے فریب بڑی سادگی سے ہم

अंदर आओ, एक नज़र रखना और खुद का आनंद लें!
जीवन से हतोत्साहित न हों
ओ जुल्फियार का आईना, हमें आश्रय दो
हम महान प्रकाश से भयभीत हैं
वह कई सालों से दोस्त हैं
उनकी नजर में हम आज अजनबी हैं
इस वसंत पार्टी में बैठे
हम बड़ी सादगी से धोखे खाते रहे


Saghar Siddiqui Urdu Poetry


Saghar Siddiqui was born in India in 1928. His real name was Muhammad Akhtar and his pen name was Saghar. He belonged to a poor family. He got education from a close family friend Habib Hasan. 

Habib was also a poet. Siddiqui was much impressed by his poetry and then started writing Urdu poetry in childhood as on the lines of Habib Hasan.

He wrote poetry in both Urdu and Punjabi languages. He was a great Urdu poet of Pakistan. His Urdu poetry includes some great verses. Siddiqui also wrote poetry for films.

He was found dead on a roadside in Lahore in 1974. He had a dog as a pet. It died in the same place where his master died a year ago.

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